दिल्ली में प्रदूषण की समस्या और अभी ।

दोस्तों दिल्ली की प्रदूषण के बारे में जानने से पहले । आप यह जान ले कि दिल्ली भारत की राजधानी है । जहां पर पूरे देश से लोगे आते हैं । और दूर-दूर से और दूसरे देशों के लोग दिल्ली को घूमने के इरादे से आते हैं । और दिल्ली में रहते हैं । और एक बात  व्यापार के क्षेत्र में दिल्ली पुड़े भारत में पहला स्थान है । यहां बहुत सारे मजदूर दिल्ली काम करने आते है । और बहुत सारे  लोग सिलाई का काम , कपड़ा का काम करने के लिए भारी और बहुत संख्या में आते हैं । दिल्ली में 3:4 की आबादी दिल्ली के बाहर की है । इस कारण से दिल्ली में बहुत भीड़ होती है और बहुत गाड़ी वाहन भी होते है ।

लाल

प्रदूषण आज विश्वव्यापी समस्या बन चुकी है । भारत सहित अन्य देशों में यह समस्या विशेष रूप से खतरनाक और विशाल रूप लेती जा रही है । भारत की राजधानी दिल्ली की गिनती विश्व के चार सबसे अधिक प्रदूषित एवं प्रभावी शहरों में होती है । आजादी के बाद जनसंख्या, शहरीकरण तथा औद्योगिकीकरण में तेजी से हुई वृद्धि ने दिल्ली का पर्यावरण बिगाड़ दिया है । हाल में सरकार , कुछ संगठनों एवं व्यक्तियों तथा न्यायालयों ने प्रदूषण पर नियंत्रण पाने की दिशा में प्रयास किए हैं । इस विषय  में राजधानी में प्रदूषण की स्थिति और उस पर नियन्त्रण के उपायों का विश्लेषण किया है ।

आजादी के बाद भारत में उधोगिकरण  के दौर आया । विभिन्न क्षेत्रों में नए-नए  company की स्थापना होने लगी । राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र होने के कारण दिल्ली के आस-पास कारखानों की स्थापना होना स्वाभाविक ही है । वर्ष 1951 के बाद दिल्ली की जनसंख्या निरन्तर बढ़ती जा रही है । उस समय 17 लाख की जनसंख्या 1991 की जनगणना के समय बढ़कर 95 लाख तक पहुँच गई ।  एक लेख के अनुसार दिल्ली की जनसंख्या प्रति वर्ष 4 लाख बढ़ जाती है , जिसमें 3 लाख लोग देश के अन्य राज्यों से आते हैं ।

दिल्ली में विकास के साथ - साथ इससे जुड़ी कुछ मूलभूत समस्याएँ मसलन आवास , यातायात , पानी बिजली इत्यादि भी उत्पन्न हुई । नगर में वाणिज्य , उद्योग , गैर - कानूनी बस्तियों , अनियोजित आवास आदि का प्रबंध मुश्किल हो गया । विश्व स्वास्थ्य संगठन की 1989 की रिपोर्ट के मुताबिक दिल्ली का प्रदूषण के मामले में विश्व में चौथा स्थान है । दिल्ली में 30 प्रतिशत वायु प्रदूषण factory  unit के कारण है , जबकि 70 प्रतिशत वाहनों के कारण है । खुले स्थान और हरे क्षेत्र की कमी के कारण यहाँ की हवा साँस और फेफड़े से सम्बन्धित बीमारियों को बढ़ाती है । इस समस्या से छुटकारा पाना सरल नहीं है । इस क्षेत्र में सरकार , न्यायालय स्वायत्त संस्थाएँ और पर्यावरण चिन्तक आगे आए हैं । इनके साझा सहयोग से प्रदूषण की मात्रा में कुछ कमी तो आई है परन्तु इसके लिए आम जनता के रचनात्मक सहयोग की सबसे अधिक आवश्यकता है ।


अंतगत्वा आपको भी अपने सहर - गांव की वातावरण का खयाल रखना है । क्योंकि ये वातावण सिर्फ हमारा नही है कि हम जी लिए हो गया । हमारे बाद भी हमारे आने वाली पीढ़ी भी इस दुनिया का मज़ा अच्छे से ले सके ।

आखिर में आपसे यही गुजारिश है कि आप अपने आस - पास तो जरूर गंदगी नही फैलाएंगे और ज्यादा से ज्यादा पेड़ -पौधे लगाएंगे ।

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