किसी भी औरत के पेट में कोई बात क्यों नही पचता है। और कुंती की कहानी।

किसी भी औरत के पेट में कोई बात क्यों नही पचता है। और कुंती की कहानी। kisi bhi aurat ke pet mein koi baat kyon nhi pachta hai. Aur kunti ki kahani.

किसी भी औरत के पेट में कोई बात क्यों नही पचता है। और कुंती की कहानी। kisi bhi aurat ke pet mein koi baat kyon nhi pachta hai. Aur kunti ki kahani.
युधिष्ठिर द्वारा कुंती कों देना। yudhishthir cruse kunti his mother

किसी भी औरत के पेट में कोई भी बात नही पचता है, यह एक  दिया हुआ श्राप है जो महाभारत के पांडु पुत्र युधिष्टिर ने अपने माँ कुंती को दिया था। और कहा था आज के बाद कोई भी औरत किसी भी बात को अपने पेट में नही रख सकती और किसी न किसी तरह वो अपने मन की बात को दुसरो को जरूर बताएगी।
किसी भी औरत के पेट में कोई बात क्यों नही पचता है। और कुंती की कहानी। kisi bhi aurat ke pet mein koi baat kyon nhi pachta hai. Aur kunti ki kahani.
Pandu ki patni, yudhishthir cruse his mother.  पांडु की पत्नी युधिष्टिर द्वारा अपनी माँ को श्राप देना।


इसका कारण,
महाभारत में जब कुंती कुवारी थी, तब एक बार ऋषि दुर्वाशा ने कुंती के घर पर आये थे। ऋषि दुर्वाशा बहुत ही गुस्से और बात-बात पर डांटने वाले ऋषि थे, इसलिए कोई भी व्यक्ति उनके प्रकोप से बचने के लिए उनके संपर्क में ज्यादा नही रहते थे।

किसी भी औरत के पेट में कोई बात क्यों नही पचता है। और कुंती की कहानी। kisi bhi aurat ke pet mein koi baat kyon nhi pachta hai. Aur kunti ki kahani.
ऋषि ध्रुवाश और कुंती। rishi dhruvasha aur kunti

तब कुंती ने बिना डर के बिना स्वार्थ के ऋषि दुर्वाशा की खूब सेवा की थी, और हमेशा ऋषि दुर्वाशा के सेवा के लिए तत्पर रहती थी। जब ऋषि दुर्वाशा ने अपने जाने की तैयारी कर रहे थे , तब ऋषि दुर्वाशा ने कुंती के सेवा भाव को देख कर कुंती को एक वरदान दिया कि तुम जब भी किसी देवता का आवाहन करोगी तो तुम्हे उस देवता के समान अंश का पुत्र की प्राप्ति होगी। और ऋषि दुर्वाशा चले गए।

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Kunti putra aur  surydev  ka putra, कुंती पुत्र और सूर्यदेव पुत्र

एक बार कुंती नदी में स्नान कर रही थी, तब उसने ऋषि दुर्वाशा के दिये वरदान को परीक्षण करने की सोची, और कुंती ने ऋषि दुर्वाशा के दिये मंत्रो का जाप करते हुए भगवान सूर्य देव का आवाहन किया, भगवान सूर्य देव प्रकट हुए और कुंती को अपने अंश के समान एक पुत्र को भेंट के रूप में दिया। और सूर्य देव ने कहा तुम्हारा ये पुत्र कर्ण के नाम से पूरी दुनिया में ज्ञात होगा, और मेरे जैसे तेज इसके अंदर रहेगी। और सूर्य देव चले जाते है।

कर्ण का जन्म होते ही वो अपने शरीर में कवच-कुंडल धारण किये रहता है, कर्ण के शरीर के नजदीक कोई भी तेज वस्तु या कोई भी गर्म पदार्थ आते ही नष्ट हो जाता है।

कुंती कर्ण को पाकर बहुत खुश होती है तो दूसरी तरफ बहुत परेशान रहती है, कुंती सोचती है बिन व्यहि लड़की अगर माँ बन जाये तो उससे बड़ा कोई पाप नही होता है, और समाज के लोग क्या कहेंगे और समाज पर इस बात का क्या फर्क पड़ेगा। और दूसरी बात कोई भी मर्द इस तरह की लड़की को कभी नही व्याहेगी।

इस बात के डर से कुंती ने कर्ण को वही पर एक संदूक में बंद करके  गंगा नदी में छोर देती है। जो हस्तिनापुर जाकर हस्तिनापुर के नगरी चम्पानगरी आ पहुचती है। जहां भीष्म पितामह के सारथी अधिरथ नामक व्यक्ति उस संदूक को खोलता है तो उसमें वो एक बच्चा को देखता है। अधिरथ की पत्नी राधा को कोई संतान नही था। इसलिए अधिरथ अपने घर कर्ण को ले आये और उसकी पालन पोषण करने लगे।

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पांडु हस्तिनापुर का राजा और अम्बालिका का पुत्र pandu hastinapur ka raja aur ambala ka putra

और इधर कुंती की शादी हस्तिनापुर के महाराज पांडु से हो गई और शादी होते ही पांडु को एक युद्ध के लिए जाना पड़ा, कुंती पांडु से कर्ण से जुड़ी बात बताना चाहती थी। लेकिन कुंती को मौका ही नही मिला पांडु से ये सब बात करने के लिए। जब पांडु युद्ध जीत के आये तो साथ में माद्री से विवाह करते हुए आये। 

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Madri aur kunti dwara bhagwan ke aavahan kar putra ki prapti माद्री और कुंती द्वरा भगवान के आवाहन कर पुत्र की प्राप्ति

उसके बाद भीष्म पितामह के आदेश से कुंती, माद्री और पांडु ने भ्रमण के लिए जंगल के लिए निकले जहां पर पांडु ने दो हिरण को विहार करते हुए देखा, तो पांडु के मन में शिकार करने की इच्छा उठी। और पांडु ने अपने सस्त्र उठाये और दोनों हिरण को एक साथ ही तीर से चिर दिए। तब हिरण दोनों प्राणी ने अपने मूल रूप में आये जो ऋषि युगल थे। 

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Pandu ko shrap kaise mila  पांडु को श्राप कैसे मिल

और ऋषि ने मरते-मरते पांडु को एक श्राप दिया कि तुम कैसे राजा हो एक विचित्र हिरण को भी नही पहचान पाए, तुम क्या प्रजा की सेवा करोगे और क्या राजा बनोगे। में तुम्हे श्राप देता हूँ कि तुम जब भी किसी स्त्री के साथ संभोग करोगे तो तुम्हारी मृत्यु उसी वक्त हो जाएगी। 

इस पर पांडु ने जब हस्तिनापुर आये तो सारी बात सुनाया, और राज्य पाठ छोड़कर सन्यासी का जीवन व्यतीत करने का फैसला लिया, और उसी वक्त राज पाठ छोड़कर जाने लगे। तब माद्री और कुंती ने भी साथ जाने की आज्ञा लिया और पांडु के साथ चल दिये। पुत्र न होने की दुःख को कुंती से देखा नही गया और उसने पांडु को अपने और ऋषि दुर्वाशा के वरदान वाली बात बताई। इस पर पांडु ने अनुरोध किया कि तुम मेरे लिए पुत्र की उत्पत्ति करो और भगवान से पुत्र प्राप्ति की आवाहन करो।

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धर्मराज युधिष्ठिर dharmaraj yudhishthir

कुंती ने सबसे पहले भगवान धर्मराज का आवाहन किया जिससे कुंती को धर्म प्रिय युधिष्टिर की प्राप्ति हुई, उसके बाद पांडु ने सोचा कि युधिष्टिर एक दिन राजा बनेगा तो राजा के देखभाल और सुरक्षा के लिए उनके भाइयों का होना जरूरी है इसलिए पांडु ने फिर से पुत्र उत्पन्न करने की अनुरोध किया तब कुंती ने वायु देव के आवाहन करके भीम की प्राप्ति की, 
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पवन पुत्र भीम pawan putr bheem

उसके बाद कुंती ने इंद्र देव का आवाहन किया जिससे अर्जुन की प्राप्ति हुई। 
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इंद्रदेव अर्जुन  indradev arjun


उसके बाद कुंती का ध्यान माद्री की तरफ गया, और माद्री को भी संतान प्राप्ति के लिए तैयार किया। और माद्री भी कुंती की मदद से संतान की प्राप्ति के लिए अश्विनी भगवान का आवाहन किया जिससे माद्री को एक साथ
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Nakul madri putra bhagwan ashwini ka gun. नकुल माद्री पुत्र भगवान अश्विनी का गुण
नकुल और सहदेव कि प्राप्ति हुई। समय चल रहा था।
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 सहदेव भगवान आश्विनी का गुण sahdev bhagwan ashwini ka gun


पांडु ने अपने सभी पुत्रो को ज्ञान शिक्षा-दीक्षा खुद से दिया और अस्त्र और सस्त्र का भी ज्ञान दिया। 

एक दिन कुंती अपने सभी पुत्रो को भ्रमण के लिए जंगल ले गई, और इधर आवास पर केवल माद्री और पांडु थे और मौशम भी वसंत का बहुत सुहाना था। पांडु को काम वासना जगी, माद्री ने पांडु को रोकते रहा लेकिन पांडु ने अपने काम वासना को रोक नही सके हो माद्री के साथ संभोग करने लगे, पांडु की मृत्यु संभोग के दौरान ही हो गई, और माद्री उनके मौत को बर्दाश्त नही कर सकी और वही पर सती हो गई।

जब कुंती को ये बात मालूम चला तो कुंती भी अपने आप को रोक न सकी। लेकिन कुंती कर भी क्या सकती है, कुंती हस्तिनापुर संवाद भेजवाकर पांडु की क्रिया कर्म की। और उसके बाद आने पांचो पुत्रो को लेकर हस्तिनापुर चली गई। वहां जाने के बाद कौरवो के साथ पांडव की भी शिक्षा दीक्षा हुई। और उन सभी को गुरु द्रोणाचार्य के पास भेज दिया गया।

आखिर में जब महाभारत का युद्ध पांडवो और कौरवो के बीच हुआ तो अर्जुन ने कर्ण को अपने तीर से मार दिया। तब कुंती ने दौड़ते-दौड़ते कर्ण को अपने कलेजे से लगा लेती है। इस पर पांडवो को बहुत आश्चर्य होता है, की ऐसा कुंती माँ ने क्यों किया। तब पांडवो को मालूम चलता है कि कर्ण भी हमारे भाई ही है। और एक माँ के कारण एक भाई दूसरे भाई की प्राण ले लिए। 

तब उसी वक्त युधिष्टिर ने अपने माँ को श्राप दिया कि आज के बाद कोई भी औरत के पेट में कोई भी बात नही पचेगा।
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