द्रोणाचार्य ने एकलव्य का अंगूठा क्यों काटा? Dronachary ne eklavya ka angutha kyon kata?

द्रोणाचार्य ने एकलव्य का अंगूठा क्यों काटा? Dronachary ne eklavya ka angutha kyon kata?

द्रोणाचार्य ने एकलव्य का अंगूठा क्यों काटा? Dronachary ne eklavya ka angutha kyon kata?
द्रोणाचार्य ने एकलव्य का अंगूठा क्यों काटा? Dronachary ne eklavya ka angutha kyon kata?


गुरु द्रोणाचार्य हस्तिनापुर के राजकुमारों को शिक्षा दे रहे थे। उसी वक्त एकलव्य ने गुरु द्रोणाचार्य से शिक्षा प्रदान करने की अनुरोध करने लगा। लेकिन गुरु द्रोणाचार्य ने शिक्षा देने से मना कर दिया क्योंकि गुरु द्रोणाचार्य ने शपथ ली थी कि मेरा ज्ञान , ताकत और मेरा जिंदगी सिर्फ हस्तिनापुर के काम आएगा। एकलव्य ने गुरु द्रोणाचार्य की ना सुनकर वापस चला गया


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लेकिन एकलव्य ने हार नही माना और गुरु द्रोणाचार्य जब जब हस्तिनापुर राजकुमारों को सिखाते उसी वक्त एकलव्य चोरी से पूरी वर्ग को देखता था। और सीखता था। ऐसा एकलव्य ने बहुत दिनों तक देखता रहा और सीखता रहा। एकलव्य ने गुरु के रूप में गुरु द्रोणाचार्य की एक मूर्ति बना रखी थी जिसकी एकलव्य पूजा करते थे और अभ्यास भी उसी मूर्ति के सामने करते थे। जिससे एकलव्य काफी ज्ञान और विद्या प्राप्त कर लिए थे।


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लेकिन एक दिन अर्जुन अपनी वान रखे हुए जगह से वान लेने गए तो वहां एक विचित्र वान मिला जिसे देखकर अर्जुन हैरत में पर गया कि ये वान किसका तब उसी समय किसी के भागने की आवाज आई अर्जुन भी उसके पीछे भागता चला गया और पीछे से गुरु द्रोणाचार्य और उनके शिष्य भी दौड़ते चले जा रहे थे। अर्जुन ने पीछा करते हुए एकलव्य के रहने वाले स्थान पर पहुच गए। जहां पर उन्होंने देखा कि गुरु द्रोणाचार्य की मूर्ति पड़ी है।


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तभी एकलव्य मूर्ति के पीछे से आता है और अर्जुन से वार्तालाप करते है और कहते है मैंने भी गुरु द्रोणाचार्य से शिक्षा ग्रहण किया है, इस पर गुरु द्रोणाचार्य कहते है झूठ बोल रहा है ये बालक ये मेरा शिष्य नही हो सकता और गुरु द्रोणाचार्य अपनी मूर्ति देखकर विवश में पर जाते है और कहते है तुम मेरे शिष्य हो तो तुम अपनी योग्यता सिद्ध करो इस पर एकलव्य तैयार हो गया। और एकलव्य ने गुरु द्रोणाचार्य के साथ आये हुए कुत्ते का मुंह बिना देखे हुए लगातार तीन वान चला कर मुँह बाँध दिया। 


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बिना किसी कुते के दर्द के ये देखकर गुरु द्रोणाचार्य को बहुत खुशी हुई कि मेरे द्वारा ज्ञान प्राप्त करके इतना अच्छा धनुर विद्या किसी ने नही सीखा है इससे गुरु द्रोणाचार्य बहुत खुश थे लेकिन विवश भी थे।


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क्योंकि गुरु द्रोणाचार्य ने शपथ लिये थे कि मेरा ज्ञान और विधा सिर्फ हस्तिनापुर के लिए काम आएगा। इसलिए गुरु द्रोणाचार्य ने सोचा कि अगर मुझसे कोई व्यक्ति ज्ञान प्राप्त करके हस्तिनापुर पर ही इस शक्ति का इस्तेमाल करेगा या हस्तिनापुर को ध्वस्त करेगा, तो में कभी भी अपने आप को माफ नही कर पाऊंगा। इसलिए गुरु द्रोणाचार्य ने एकलव्य के साथ छल किया और गुरु दक्षिणा माँगा और कहा तुम मेरे शिष्य हो तो मुझे गुरु दक्षिणा दो। इस पर एकलव्य ने कहा आप मुझसे कुछ भी मांग सकते है गुरुदेव।


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तब गुरु द्रोणाचार्य ने कहा कि तुम मुझे अपने दाएं हाथ का अंगूठा काट कर दो। इससे वहां उपस्थित सभी लोग घबरा कर डर गए कि गुरु द्रोणाचार्य ने क्या मांग लिया एकलव्य से इस पर एकलव्य को भी बहुत दुख हुआ लेकिन एकलव्य अपने गुरु के सम्मान में अपनी अंगूठा काटकर गुरु द्रोणाचार्य को गुरु दक्षिणा के रूप में दिया ।


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इस तरह से गुरु द्रोणाचार्य को भी मजबूरी वश एकलव्य का अंगूठा दक्षिणा स्वरूप मांगना पड़ा था। हालांकि गुरु द्रोणाचार्य को भी ये बात अछि नही लगी लेकिन हस्तिनापुर के समर्पण के कारण गुरु द्रोणाचार्य को एकलव्य का अंगूठा दक्षिणा स्वरूप मांगना पड़ा था।


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बहुत से बात होती से गुरु द्रोणाचार्य के और एकलव्य के अंगूठा दक्षिणा स्वरूप देने के संबंध में बहुत से लोग कहते है गुरु द्रोणाचार्य ने अर्जुन को दुनिया का सर्वश्रेष्ठ धनुधर बनाने के लिए एकलव्य का अंगूठा काटा था ।


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लेकिन एकलव्य अंगूठा न होने के बाबजूद भी हार नही माने और अपने हथेली और चारो अंगुली के सहारे ही बहुत कारनामे किये और कई राज्य और प्रान्त जीते है।
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