अर्जुन के बारह वर्ष के ब्रह्मचारी जीवन की कथा क्या है? Arjun ke barah varsh ke brahmchari jeevan ki katha kya hai?

अर्जुन के बारह वर्ष के ब्रह्मचारी जीवन की कथा क्या है? Arjun ke barah varsh ke brahmchari jeevan ki katha kya hai?


अर्जुन के बारह वर्ष के ब्रह्मचारी जीवन की कथा क्या है? Arjun ke barah varsh ke brahmchari jeevan ki katha kya hai?
अर्जुन के बारह वर्ष के ब्रह्मचारी जीवन की कथा क्या है? Arjun ke barah varsh ke brahmchari jeevan ki katha kya hai?

एक दिन एक ब्राह्मण की गाय को कुछ लुटेरे उठा ले गए। ब्राह्मण रोता हुआ अर्जुन के पास आया। अर्जुन ने उसे रक्षा का आश्वासन दिया। फिर वे चक्कर में पड़ गए। क्योंकि अस्त्र शस्त्र उस महल में था जहां युधिष्ठिर द्रौपदी थे। फिर वे कर्तव्य निभाने के लिए उस महल से सस्त्र ले लुटेरे से ब्राह्मण की गाय लेकर वापस कर दिए। उसके बाद नियम पालन हेतु वन जाने को तैयार हो गए।

अर्जुन के बारह वर्ष के ब्रह्मचारी जीवन की कथा क्या है? Arjun ke barah varsh ke brahmchari jeevan ki katha kya hai?
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युधिष्ठिर को यह देख बड़ा दुख हुआ। उन्होंने अर्जुन को समझाया आपातकाल में मर्यादा का ध्यान नही किया जाता। इसलिए मैं तुम्हें क्षमा करता हूं। लेकिन अर्जुन नहीं माने वनवास के लिए निकल पड़े। हरिद्वार पहुंचकर गंगा स्नान हेतु जैसे ही अर्जुन जल के अंदर डुबकी लगाये। वैसे ही उलूपी नामक एक नाग अर्जुन को  खींच कर ले गई अंदर ले गई। अंदर जाकर बोली मैं नाग कन्या हूं और आप से मुझे शरीरिक संबंध बनाने है आप मेरी इक्षा पूर्ति करें।

अर्जुन के बारह वर्ष के ब्रह्मचारी जीवन की कथा क्या है? Arjun ke barah varsh ke brahmchari jeevan ki katha kya hai?
अर्जुन के बारह वर्ष के ब्रह्मचारी जीवन की कथा क्या है? Arjun ke barah varsh ke brahmchari jeevan ki katha kya hai?

अर्जुन बोले सुंदरी मैं बारह वर्ष तक ब्रह्मचर्य रहने की शपथ ली है। अतः मैं इच्छा पूर्ति करने में असमर्थ हूँ। उलुपी ने कहा अगर मेरी इक्षा पूर्ति नहीं करोगे तो मैं अपना जान दे दूंगी। उलूपी के ऐसे बचन को सुनकर अर्जुन ने उसकी इक्षा पूर्ति कर दी। वहां से चलकर अर्जुन मणिपुर पहुंचे। मणिपुर के राजा चित्र वाहन की कन्या चित्रांगदा को देखकर अर्जुन कामांध हो गए। और चित्रवाहन से अपना परिचय देकर प्राप्त करने के लिए निवेदन किया। चित्रवाहन इस शर्त पर तैयार हुए कि मेरी कन्या से जो पुत्र उत्पन्न होगा वह उनका दत्तक पुत्र होगा। अर्जुन तैयार हो गए कुछ दिन बाद तो चित्रांगदा को पुत्र हुआ। अर्जुन चित्रांगदा को समझा कर कहा मैं अब आगे की ओर प्रस्थान कर रहा हूं। जब इंद्रप्रस्थ में राज्यसूय यज्ञ होगा तब अपने पिता के साथ आना।

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वहां से चलकर अर्जुन प्रभास नामक क्षेत्र पहुँचे।  श्री कृष्ण भगवान अर्जुन के आने का समाचार सुन कर बहुत प्रसन्न हुए। रैबत पर्वत पर रहने का सारा प्रबंध करा दिए। अर्जुन बड़े प्रेम से वहाँ रहने लगे। एक दिन अर्जुन की दृष्टि सुभद्रा पर पड़ी। सुभद्रा श्री कृष्ण जी की बहन थी। अर्जुन सुभद्रा को छठा के रूप में देख मोहित हो गए। श्री कृष्ण जी अर्जुन के मनोभाव को पढ़ गए और बोले अर्जुन तुम सुभद्रा का हरण कर लो। वह तुम्हारी पत्नी बनने लायक है। बाकी यादव को मैं संभाल लूंगा।

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फिर एक दिन उत्सव से सुभद्रा जब घर लौटने लगी तब अर्जुन ने बलपूर्वक सुभद्रा को रात पर चढ़ा भाग निकले। जब यादवों क्या यह समाचार ज्ञात हुआ तो वे क्रोधित हो उठे लेकिन श्री कृष्ण के समझाने से सभी का क्रोध शांत हो गया। और खुशी-खुशी सुभद्रा का विवाह अर्जुन से करा दिया। कुछ दिन अर्जुन द्वारिका में रहे। वहां से फिर पुष्कर होते हैं बारह वर्ष में इंद्रप्रस्थ लौट आएं।

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