पांडव और द्रौपदी ने अपने प्राण का त्याग कैसे किया? पांडव और द्रौपदी की मृत्यु कैसे हुई?

पांडव और द्रौपदी ने अपने प्राण का त्याग कैसे किया? पांडव और द्रौपदी की मृत्यु कैसे हुई? Pandav aur draupadi ne apne pran ka tyag kaise kiya?

पांडव और द्रौपदी ने अपने प्राण का त्याग कैसे किया? पांडव और द्रौपदी की मृत्यु कैसे हुई? Pandav aur draupadi ne apne pran ka tyag kaise kiya?

धर्मराज युधिष्टिर को श्री कृष्ण, बलदेव सहित सभी यदुवंसियों का नाश सुनकर मन विरक्त हो गया। सभी भाइयों से विचार विमर्श कर युयुत्सु को बुला राज्य की देख रेख का भार सौप कर हस्तिनापुर के सिहांशन पर अभिमन्यु पुत्र परीक्षित को बिठा राज्यअभिषेक कर दिए। 
पांडव और द्रौपदी ने अपने प्राण का त्याग कैसे किया? पांडव और द्रौपदी की मृत्यु कैसे हुई? Pandav aur draupadi ne apne pran ka tyag kaise kiya?

फिर द्रौपदी सहित सभी भाई राजसी वस्त्र वतकल वस्त्र धारण कर वन को चल दिए। नगरवासी कुछ दूर जाने के बाद वापस आ गए। सबसे आगे युधिष्ठिर, भीमसेन, अर्जुन, नकुल, सहदेव और सबसे पीछे द्रौपदी चल रही थी। 

पांडव और द्रौपदी ने अपने प्राण का त्याग कैसे किया? पांडव और द्रौपदी की मृत्यु कैसे हुई? Pandav aur draupadi ne apne pran ka tyag kaise kiya?

हिमालय की चढ़ाई में सर्वप्रथम द्रौपदी गिर पड़ी और प्राण निकल गए। एक-एक कर भीमसेन, सहदेव, नकुल एवं अर्जुन भी चलते-चलते गिर पड़े और प्राण त्याग दिए। अंत में सिर्फ युधिष्ठिर ही एकमात्र अकेले बढ़ते गए। उनके पीछे - पीछे में एक कुत्ता भी चल रहा था। 
पांडव और द्रौपदी ने अपने प्राण का त्याग कैसे किया? पांडव और द्रौपदी की मृत्यु कैसे हुई? Pandav aur draupadi ne apne pran ka tyag kaise kiya?

उसी समय स्वयं इंद्र रथ पर सवार हो युधिष्ठिर को स्वर्ग ले जाने के लिए उनके पास पहुंचे। और पर बैठने को कहा। युधिष्टिर द्रौपदी सहित भाइयों के वियोग के कारण बैठने को तैयार नहीं हुए। तब इन्द्र देव ने कहा युधिष्टिर तुम चिंता मत करो।वे सभी स्वर्ग पहुंच चुके है। अतः तुम कुत्ते को छोड़ चले आओ। 
पांडव और द्रौपदी ने अपने प्राण का त्याग कैसे किया? पांडव और द्रौपदी की मृत्यु कैसे हुई? Pandav aur draupadi ne apne pran ka tyag kaise kiya?

युधिष्टिर ने कहा यह मेरा पूरा रास्ता साथ देते आया है मै इसे नहीं छोड़ सकता। कुत्ता वास्तव में धर्मराज थे। वे असली रूप में प्रकट हो युधिष्ठिर को आआशीर्वाद देकर अंतर्ध्यान हो गए। युधिष्टिर रथ पर सवार हो स्वर्ग चले गए।

श्री कृष्ण के वंसज यदुवंशी का विनाश कैसे हुआ?

श्री कृष्ण के वंसज यदुवंशी का विनाश कैसे हुआ? Shri krishan ke vansaj yaduvanshi ka vinash kaise hua?

श्री कृष्ण के वंसज यदुवंशी का विनाश कैसे हुआ? Shri krishan ke vansaj yaduvanshi ka vinash kaise hua?

महाभारत युद्ध के 35 वर्ष बाद 36 वर्ष में द्वारकापुरी में बड़े-बड़े भयंकर अपशकुन होने लगे। वहांसभी अनीति कर्म करने लगे। एक बार विश्वामित्र कण्व तथा अन्य ऋषियों के साथ वहां पधारें। उन्हें देख वहां के वासी ने उनसे मजाक करने की सोची। सभी ने जामवंती के पुत्र शाम्ब को स्त्री के रूप बना कमर में थोड़ी कपड़े को लपेट ऋषि के पास जाकर बोले - महाराज ! इस स्त्री को पुत्र होगा या पुत्री कृपया बता दे।
श्री कृष्ण के वंसज यदुवंशी का विनाश कैसे हुआ? Shri krishan ke vansaj yaduvanshi ka vinash kaise hua?

ऋषियों ने क्रोध में श्राप दे कहा - इससे ऐसा मुसल पैदा होगा। जो बलदेव और श्री कृष्ण को छोड़ सारा यदुवंशी को नष्ट कर देगा। कुछ समय बाद शाम के पेट से मुसल निकला। जिसे सबने मिलकर उसे जला डाला। और समुंद्र किनारे राख को फेक दी। वर्षा होने पर वहाँ बड़े-बड़े घास उग आएं। कृष्ण जी ने यादव वंसज के नष्ट निकट में आता देख सभी को तीर्थ यात्रा करने की सलाह दी।
श्री कृष्ण के वंसज यदुवंशी का विनाश कैसे हुआ? Shri krishan ke vansaj yaduvanshi ka vinash kaise hua?

सभी अपने अपने बाल बच्चे समेत प्रभास तीर्थ पहुंचे। यहां सभी मदिरा पीकर महाभारत युद्ध की चर्चा करने लगे। सात्यिक और कृतवर्मा में तू तू मैं मैं हो गई। सात्यिक ने कृतवर्मा की गर्दन काट डाली। विरोधियों ने कृष्ण पुत्र प्रधुम्न को मार डाला। श्री कृष्ण पुत्र शोक में क्रोधित हो समुंद्र किनारे उगे घास को खास को उखाड़कर सभी को मारने लगे। घास मुसल बन-बन कर यादव का नाश करने लगी। इस तरह सभी यादवो का विनाश देख बलराम व श्री कृष्ण शोक में एक वृक्ष के नीचे बैठे थे। बलराम जी के मुख से एक सफेद सर्प निकलकर समुंद्र में चली गई। बलदेव जी निर्जीव हो गए। बलदेव का प्राण त्याग देखकर श्री कृष्ण शोक मगन में बैठे थे। तभी जरा नामक शिकारी का वान उनके पैरों में लगा। उसने श्री कृष्ण का पैर पकड़ क्षमा याचना की। कृष्ण जी उसे समझा कर भेज दिए। और स्वयं पृथ्वी और आकाश को प्रकाशित करते हुए स्वर्ग को चले गए।


हस्तिनापुर वरिष्ठ ध्रितराष्ट्र, विदुर, गान्धारी और कुंति की मृत्यु कैसे हुई?

हस्तिनापुर वरिष्ठ ध्रितराष्ट्र, विदुर, गान्धारी और कुंति की मृत्यु कैसे हुई? Hastinapur varishth dhritarashhtr, vidur, gandhari aur kunti ki mrityu kaise huye?

हस्तिनापुर वरिष्ठ ध्रितराष्ट्र, विदुर, गान्धारी और कुंति की मृत्यु कैसे हुई? Hastinapur varishth dhritarashhtr, vidur, gandhari aur kunti ki mrityu kaise huye?

पांडवों ने पंद्रह वर्षों तक धृतराष्ट्र व गान्धारी की सेवा की। एक दिन धृतराष्ट्र ने युधिष्ठिर से कहा - अब हम लोग वनवास जीवन व्यतीत करना चाहते हैं।  व्यास जी के समझाने पर युधिष्ठिर ने आजा दे दी।  धृतराष्ट्र, गंधारी, संजय, विदुर जी एवं पांडवों की माता कुंती भी वन में चली गई। वन में ही विदुर जी अपने प्राण का त्याग कर दिए। संजय हिमालय की ओर चले गए।
हस्तिनापुर वरिष्ठ ध्रितराष्ट्र, विदुर, गान्धारी और कुंति की मृत्यु कैसे हुई? Hastinapur varishth dhritarashhtr, vidur, gandhari aur kunti ki mrityu kaise huye?

एक बार धृतराष्ट्र, गंधारी, कुंती घने वन में घूम रहे थे। तभी उस वन में चारों ओर से अग्नि भड़क उठी। वे तिनके उससे बाहर ना सके। उसी में जल गए।  पांडवों को जब ज्ञात हुआ। तो बहुत दुखी हुए। फिर उन सभी का श्राद कर्म पूर्ण किया।

अर्जुन की मृत्यु उसके पुत्र बभ्रु वाहन द्वारा कैसे हुआ?

अर्जुन की मृत्यु उसके पुत्र बभ्रु वाहन द्वारा कैसे हुआ? Arjun ki mrityu uske putra babhruvahan  dwara kaise hua?

अर्जुन की मृत्यु उसके पुत्र बभ्रु वाहन द्वारा कैसे हुआ? Arjun ki mrityu uske putra babhruvahan  dwara kaise hua?

युधिष्ठिर भिष्म आदि गुरुजनों की मृत्यु से दुःखित रहते थे। श्री कृष्ण ने उन्हें अश्वमेघ यज्ञ करने को कहा  इधर उतरा के गर्भ से परीझित का जन्म मृत्यु के जैसे हुआ। ऐसे बालक को देख कुंती, द्रौपदी और सुभद्रा विलाप करने लगी।  
अर्जुन की मृत्यु उसके पुत्र बभ्रु वाहन द्वारा कैसे हुआ? Arjun ki mrityu uske putra babhruvahan  dwara kaise hua?

श्री कृष्ण ने जल लेकर आचमन कीया और अपने योग बल से उस बालक में प्राण संचार कर दीया। सभी हर्षित हो उठें। वेदव्यास द्वारा शुभ मुहूर्त में संपन्न हुआ। श्याम कर्ण घोड़े को छोड़ा गया। घोड़े की रक्षा ले लिए अर्जुन ऊनी सेना लेकर उसके पीछे चले। सभी राजाओं को जीतते हुए मणिपुर पहुंचे। यहां उलपी द्वारा उत्पन्न अर्जुन पुत्र बभ्रु वाहन ने घोर युद्ध कर अर्जुन को मार डाला। 
अर्जुन की मृत्यु उसके पुत्र बभ्रु वाहन द्वारा कैसे हुआ? Arjun ki mrityu uske putra babhruvahan  dwara kaise hua?

उलपी द्वारा निंदा करने पर बभ्रु वाहन ने माता द्वारा लाई मनी से पुनः अर्जुन को जीवित कर उनसे क्षमा मांगी। फिर बाकी सभी राजाओं पर विजय प्राप्त कर वापस हस्तिनापुर पहुंचे। उनके पहुचते ही यज्ञ का सभी कार्य पूर्ण हुआ।

भिष्म पितामह ने मृत्यु के दौरान युधिष्टिर को कैसी शिक्षा दी?

भिष्म पितामह ने मृत्यु के दौरान युधिष्टिर को कैसी शिक्षा दी? Bhishm pitamah ne mrityu ke dauran yudhishthir ko kaisi shiksha di?

भिष्म पितामह ने मृत्यु के दौरान युधिष्टिर को कैसी शिक्षा दी? Bhishm pitamah ne mrityu ke dauran yudhishthir ko kaisi shiksha di?

भिष्म पितामह ने युधिष्ठिर के बहुत से प्रश्नों का उत्तर भी दिए। और कहा - जो गृहस्थ पुरुष अतिथि का सत्कार नहीं करता, वह अतिथि अपना पाप गृहस्थ को देकर उसका पुण्य लेकर चला जाता है। तुम भी अतिथि सत्कार से पीछे मत हटना। उधोग पुरुष को धन, मित्र, ऐश्वर्य और लक्ष्मी सभी प्राप्त होता है। प्रारब्ध के भरोसे बैठे रहने से कुछ भी प्राप्त नहीं होता है। 
भिष्म पितामह ने मृत्यु के दौरान युधिष्टिर को कैसी शिक्षा दी? Bhishm pitamah ne mrityu ke dauran yudhishthir ko kaisi shiksha di?

इसी प्रकार भिष्म ने और भी बहुत सी बातें बताई। और कहा - क्षात्र धर्म का पालन करते हुए पितृगण तथा देवगणों को प्रसन्न रखते हुए अपने प्रजा का पालन करो। तुम्हारे मन का सभी संताप दूर हो जाएगा। सूर्य के उत्तरायण होने पर पुनः मेरे पास आना।
भिष्म पितामह ने मृत्यु के दौरान युधिष्टिर को कैसी शिक्षा दी? Bhishm pitamah ne mrityu ke dauran yudhishthir ko kaisi shiksha di?

पचास दिन बाद सूर्य के उत्तरण होने पर माघ शुक्ल अष्टमी के दिन युधिष्ठिर अपने बंधु एवं श्री कृष्ण के साथ भिष्म के अग्नि संस्कार के संपूर्ण सामग्री लेकर कुरुक्षेत्र पहुंचे। सभी पहुंचकर भिष्म के चरण स्पर्श किए। भिष्म ने -  श्री कृष्ण से कहा अब मुझे जाने की आज्ञा दें। श्री कृष्ण ने तथास्तु कह दिया। भिष्म ने श्री कृष्ण को प्रणाम कर अपना प्राण त्याग दिए। युधिष्टिर ने परिवार सहित विधि पूर्वक उनका श्राद्ध कर्म किया।
भिष्म पितामह ने मृत्यु के दौरान युधिष्टिर को कैसी शिक्षा दी? Bhishm pitamah ne mrityu ke dauran yudhishthir ko kaisi shiksha di?

गान्धारी ने श्री कृष्ण को श्राप क्यों दिए?

गान्धारी ने श्री कृष्ण को श्राप क्यों दिए? Gandhari ne shri krishan ko shrap kyon diye?

गान्धारी ने श्री कृष्ण को श्राप क्यों दिए? Gandhari ne shri krishan ko shrap kyon diye?

गांधारी ने श्री कृष्ण से कहा - है कृष्ण। तुम्हारे कारण ही मेरे वंश का विनाश हुआ है। इसलिए मैं अपने पति सेवा के वल पर श्राप देती हूं, कि आज से 36 वर्ष बाद तुम भी अपनी जाति का नाश कर वन में मारे जाओगे।
गान्धारी ने श्री कृष्ण को श्राप क्यों दिए? Gandhari ne shri krishan ko shrap kyon diye?

श्री कृष्ण ने कहा - है गंधारी तुमने वही कहा जो होना है। इसमें कोई कुछ नहीं कर सकता। इसलिए क्रोध को त्याग कर शान्त होवो। फिर सभी वीर योद्धाओं का दाह क्रिया की गई।

महाभारत युद्ध में दुर्योधन की मृत्यु कैसे हुई? Mahabharat yudh mein duryodhan ki mrityu kaise huye?

महाभारत युद्ध में दुर्योधन की मृत्यु कैसे हुई? Mahabharat yudh mein duryodhan ki mrityu kaise huye?

महाभारत युद्ध में दुर्योधन की मृत्यु कैसे हुई? Mahabharat yudh mein duryodhan ki mrityu kaise huye?

महाभारत युद्ध में कौरवो की हार देखकर दुर्योधन वहां से भाग गया। अस्वाथाम, कृपाचार्य को संजय द्वारा दुर्योधन के छिपने की खबर मालूम हुई तो वे तलाब के पास जाकर जोर से पुकारे - है दुर्योधन तुम बाहर निकलो और चलकर पांडवों से संघर्ष करो। हम लोग तुम्हारी रक्षा करेंगे। दुर्योधन बोला मैं घाव से पीड़ितों हूँ। कल युध्द करेंगे। पांडव लोग भी दुर्योधन का पता कर रहे थे। क्योंकि दुर्योधन के रहते पांडव विजयी नहीं हो सकते थे। 
महाभारत युद्ध में दुर्योधन की मृत्यु कैसे हुई? Mahabharat yudh mein duryodhan ki mrityu kaise huye?

एक शिकारी द्वारा पांडवों को दुर्योधन की छिपने का स्थान मालूम हुआ। तुरंत युधिष्ठिर, भीम आदि सेना लेकर वहां पहुंचे। अश्वत्थामा, कृपाचार्य, कृतवर्मा ने पांडवों को आते देख दुर्योधन को सावधान कर स्वयं पेड़ो पर जाकर छुपा गया। युधिष्ठिर तलाब के किनारे खरा होकर दुर्योधन को बोले - हे दुर्योधन - है दुर्योधन ! तुम अपनी सभी भाइयों और क्षत्रियों को मरवाकर कायर की तरह यहां छिपे हो। धिक्कार है तुम्हें। तुम बाहर निकलो और वीरों की तरह  लड़कर मरो या मारो।
महाभारत युद्ध में दुर्योधन की मृत्यु कैसे हुई? Mahabharat yudh mein duryodhan ki mrityu kaise huye?

दुर्योधन बोला - हे धर्मराज मैं प्राण मोह से यहां नहीं छिपा हूं। मैं घायल हूं और सिर्फ एक गद्दा मेरे पास है। मैं एक-एक से गदा युद्ध कर सकता हूं।  युधिष्ठिर के आश्वासन पर दुर्योधन गद्दा लिए तलाब से बाहर निकला।  सर्वप्रथम भीम हि दुर्योधन से लड़ने आए। दोनो में भयंकर गदा युद्ध छिड़ गया। 
महाभारत युद्ध में दुर्योधन की मृत्यु कैसे हुई? Mahabharat yudh mein duryodhan ki mrityu kaise huye?

भीम ने अपनी प्रतिज्ञानुसार दुर्योधन की जांघ को अपनी गद्दा से तोड़ डाली। दुर्योधन धारासाई हो भूमि पर गिर पड़ा। दुर्योधन को छोड़ सभी पांडव कृष्ण सहित चले गए।

महाभारत युद्ध में द्रोणाचार्य पुत्र अस्वाथामा की क्या भूमिका थी?

महाभारत युद्ध में द्रोणाचार्य पुत्र अस्वाथामा की क्या भूमिका थी? Mahabharat yudh mein dronachary putr aswathama ki kya bhumika thhi?

महाभारत युद्ध में द्रोणाचार्य पुत्र अस्वाथामा की क्या भूमिका थी? Mahabharat yudh mein dronachary putr aswathama ki kya bhumika thhi?

दुर्योधन की दर्दनाक मृत्यु देख अश्वत्थामा पांडवों पर बहुत क्रोधित हुआ।  उसमें कृपाचार्य और कृतवर्मा से कहा - आज रात्रि को मैं पांडव को समूल नाश कर डालूंगा। ऐसा कह वह रात्रि का इंतजार करने लगा। अर्ध रात्रि होते ही वह पांडवों के शिविर की तरफ चला गया। उसके साथ कृतवर्मा और कृपाचार्य भी गए। 
महाभारत युद्ध में द्रोणाचार्य पुत्र अस्वाथामा की क्या भूमिका थी? Mahabharat yudh mein dronachary putr aswathama ki kya bhumika thhi?

अश्वत्थामा धृतधुमं के शिविर में घुस उसे पशु की तरह चीड़ कर मार डाला। उसके बाद द्रौपदी के पांचों पुत्र के शिविर में घुस उसे भी मार डाला। शिविर से बाहर जो भागते उसे कृपाचार्य, कृतवर्मा अपने तलवारों से मार डालते। अस्थमा ने शिखंडी को भी मार डाला। इस तरह कितने पांडव पक्ष का  संहार कर सुबह होते ही वहां से कृपाचार्य, कृतवर्मा सहित भाग खड़े हुए।
महाभारत युद्ध में द्रोणाचार्य पुत्र अस्वाथामा की क्या भूमिका थी? Mahabharat yudh mein dronachary putr aswathama ki kya bhumika thhi?

सुबह होते ही जब पांडवों को यह सब ज्ञात हुआ, तो वे आश्चर्य चकित रह गए। यह देख युधिष्ठिर, श्री कृष्ण सहित भीमसेन, अर्जुन को लेकर अश्वत्थामा की खोज करने निकले। जब अश्वथामा ने पांडवों को अपने ओर आते देखा तो उसने मंत्र पढ़कर यह संसार पांडवों से रहित हो जाए कहकर ब्रम्हास्त्र को छोड़ दिया। ऋषियों के अनुरोध पर उसने कहा छोड़ना जानता हूं वापस करना नहीं। अतः मैं पांडवों को छोड़ उतरा के गर्भ की तरफ मोड़ देता हूं। उतरा उस समय गर्भवती थी। 
महाभारत युद्ध में द्रोणाचार्य पुत्र अस्वाथामा की क्या भूमिका थी? Mahabharat yudh mein dronachary putr aswathama ki kya bhumika thhi?

इसलिए श्री कृष्ण ने उतरा के गर्भ की रक्षा की। फिर अर्जुन ने श्री कृष्ण के कहने पर तलवार की नोक से  अस्वाथाम के मस्तक से मनी निकाल ली और। कहां तुम 3000 ( तीन हजार) वर्ष तक पृथ्वी पर यो ही भटकते रहोगे। तेरे शरीर से हमेशा पिव और गंध निकलती रहेगी।  और अश्वत्थामा को वहां से बहुत दूर खदेड़ दिया।

मद्रराज शाल्य और सकुनी का वध कैसे हुआ?

मद्रराज शाल्य और सकुनी का वध कैसे हुआ? Madraraj saal aur shakuni ka vadh kaise hua?

मद्रराज शाल्य और सकुनी का वध कैसे हुआ? मद्रराज शाल्य और सकुनी का वध कैसे हुआ? मद्रराज शाल्य और सकुनी का वध कैसे हुआ? Madraraj saal aur shakuni ka vadh kaise hua? saal aur shakuni ka vadh kaise hua? saal aur shakuni ka vadh kaise hua?

कौरवो ने अश्वत्थामा के परामर्श से शाल्व को प्रधान सेनापति बनाया। शल्य ने पूरी सेना ले युद्ध में आ डटे। दोनों तरफ अब थोड़ी थोड़ी ही सेना बची थी। दोनों सेनाओं में भयंकर युद्ध छिड़ गया। 
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युधिष्ठिर ने शल्य का वध डाला। सहदेव ने शकुनि का वध कर उसके शरीर के टुकडे टुकडे कर डाला।  यह देख कौरव सेना भागने लगी। भागती सेना को दुर्योधन पुनः रोककर युद्ध करने को भेजा। अब कोई प्रधान योद्धा भी दुर्योधन के पक्ष में नहीं बचा था।  घायल दुर्योधन भय से अपनी गद्दा लेकर पैदल पूर्व दिशा में भाग गया।
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महाभारत युद्ध में कर्ण की मृत्यु कैसे हुई?

महाभारत युद्ध में कर्ण की मृत्यु कैसे हुई? Mahabharat yudh mein karn ki mrityu kaise huye?

महाभारत युद्ध में कर्ण की मृत्यु कैसे हुई? Mahabharat yudh mein karn ki mrityu kaise huye?

सोलहवें दिन अश्वत्थामा और भीम में भयंकर युद्ध छिड़ गया। इस दिन मुख्य सेनापति कर्ण को ही दुर्योधन ने बनाया था। कर्ण का सारथी नकुल सहदेव के मामा मद्रराज शाल्य बने थे। सारथी बनने से पहले मद्र राज शाल्य और कर्ण  में बहुत वाक्य युद्ध हुए थे। फिर इस आश्वासन पर की युद्ध में उससे तर्क नहीं करेगा तब सारथी बने थे। इधर फिर भीम और दुशासन में युद्ध छिड़ गया था। अपनी प्रतिज्ञा अनुसार भीम ने दुःशाशन को घायल कर डाला। और सबके सामने उसे उठा पृथ्वी पर पटक उसको गला दबाकर मार डाला। फिर उसके छाती को चीरकर उसके गर्म लहू को पिये।
महाभारत युद्ध में कर्ण की मृत्यु कैसे हुई? Mahabharat yudh mein karn ki mrityu kaise huye?

सत्रहवें दिन युद्ध में महावीर कर्ण ने पांडवो की सेना को नष्ट करना शुरु कर दिया। भीम ने दुर्योधन के छह भाइयों को मार डाला। दुर्योधन को भीम के पास से भागना पड़ा। अर्जुन की नजर कर्ण पुत्र वृषेन पर पड़ी। क्रोधित हो अर्जुन ने धनुष पर वान चढ़ाकर। अश्वत्थामा तथा दुर्योधन को सुनाकर बोले तुम लोगों ने मिलकर अकेला असहाय, रथहीन, शस्त्रहीन मेरे पुत्र अभिमन्यु को धोखे से मारा था। परंतु मैं सबके सामने कर्ण पुत्र का वध कर रहा हूं। जिससे शक्ति हो आकर बचा ले। इतना कह अर्जुन ने वृषेन को मार डाला।
महाभारत युद्ध में कर्ण की मृत्यु कैसे हुई? Mahabharat yudh mein karn ki mrityu kaise huye?

उसके बाद कर्ण और अर्जुन का रथ युद्ध में आमने सामने हो गया। आकाश से देवता, मुनि,  राक्षस,  गंधर्व, यक्ष आदि भी कर्ण अर्जुन युद्ध देखने लगे। दोनों वीरो में घमासान युद्ध शुरू हो गया। अर्जुन ने कर्ण के रथ के घोड़े को मार डाला। रथ का पहिया धरती में धंस गया। कर्ण अत्यधिक घायल भी हो गया था। इस समय वह परशुराम जी द्वारा दिया गया घोर अस्त्र भी भूल गया। कर्ण रथ से उतरकर अपने रथ का पहिया पृथ्वी से निकालने का प्रयत्न करने लगा। और अर्जुन से बोला - अर्जुन जब तक मैं इस रथ के पहिये को ना निकाल लूं। तब तक तुम मुझ पर प्रहार मत करना। क्योंकि तुम धर्म पूर्वक युद्ब करने वाले हो।
महाभारत युद्ध में कर्ण की मृत्यु कैसे हुई? Mahabharat yudh mein karn ki mrityu kaise huye?

श्री कृष्ण ने कर्ण से कहा - है कर्ण इस समय प्राण संकट में परने पर तुम्हें धर्म याद आ रहा है। जब तुम राजस्वला में द्रौपदी को एक वस्त्रा में भरी सभा में तमाशा देखते रहे। भीम को जान से मारने के लिए जहर दिया, निहत्थे अभिमन्यु को तुम सब ने मिलकर मार डाला था। उस समय तुम्हारा धर्म कहां था। अब तुम्हारी मृत्यु निश्चित है। फिर श्री कृष्ण के कहने पर अर्जुन ने कर्ण पर दिव्य शास्त्रो का प्रयोग करने लगा। कर्ण ने भी उसके वानो को काट अर्जुन को मूर्छित कर दिया और पुनः पहिये निकालने लगा। अर्जुन सचेत होते ही आंजलिक महामंत्र से आमंत्रित कर कर्ण के ऊपर छोड़ दिया। उस वान के लगते ही कर्ण धरासाई होकर पृथ्वी पर गिर गया। कौरव में भाग दर मची गई। सूर्यास्त होते हैं युद्ध बंद हो गए।
महाभारत युद्ध में कर्ण की मृत्यु कैसे हुई? Mahabharat yudh mein karn ki mrityu kaise huye?

गुरु द्रोणाचार्य की मृत्यु कैसे हुई?

गुरु द्रोणाचार्य की मृत्यु कैसे हुई? Guru dronachary ki mrityu kaise huye?

गुरु द्रोणाचार्य की मृत्यु कैसे हुई? Guru dronachary ki mrityu kaise huye?

सूर्योदय के बाद दुर्योधन के उकसाने पर द्रोणाचार्य ने पांडवों की सेना को भीषण संहार करना शुरु कर दिया। श्री कृष्ण ने अर्जुन से कहा - हे अर्जुन जब तक आचार्य के हाथों में धनुष रहेगा। इन्हें जितना असंभवता है। अतः किसी प्रकार इनके पुत्र के मरने की खबर इन्हें यदि मिले तब यह विचलित हो जाएंगे। 
गुरु द्रोणाचार्य की मृत्यु कैसे हुई? Guru dronachary ki mrityu kaise huye?

भीमसेन ने यह सुन इंद्र वर्मा नामक राजा के हाथी का जिसका नाम भी अश्वत्थामा था। अपनी गदा से मार डाले। फिर श्री कृष्ण ने युधिष्ठिर से कहा - आप अस्थमा के मरने की सूचना प्रसारित करें। अपनी सेना को नष्ट होने से बचा ले। उधर भीम चिल्ला रहे थे अस्वाथमा मर गया। यह सुन द्रोणाचार्य ने विचलित होकर युधिष्ठिर से पूछा। अपने विजय की खातिर युधिष्ठिर ने भी कहा सही में अस्वाथाम मर गया। किन्तु धीरे स्वर में यह भी कहा मनुष्य नहीं हाथी। 
गुरु द्रोणाचार्य की मृत्यु कैसे हुई? Guru dronachary ki mrityu kaise huye?

पुत्र मृत्यु के वियोग में द्रोणाचार्य असहाय होकर रथ पर सस्त्र रख बैठ गए। तभी द्रुपद पुत्र धृतधुमं ने उनके रथ पर चढ़कर अपनी तलवार से आचार्य द्रोणाचार्य के सर को काट डाला।

महाभारत युद्ध में घटोतकच की मृत्यु कैसे हुई?

महाभारत युद्ध में घटोतकच की मृत्यु कैसे हुई? Mahabharat yudh mein ghatotkach ki mrityu kaise huye?

महाभारत युद्ध में घटोतकच की मृत्यु कैसे हुई? Mahabharat yudh mein ghatotkach ki mrityu kaise huye?

जयद्रथ की मृत्यु से दुःखित  कृपाचार्य व अश्वत्थामा अर्जुन पर वान वर्षा करने लगे। फिर घमासान युद्ध शुरू हो गया। पांडवों की ओर से भीम पुत्र घटोत्कच ने अपने माया जाल से कौरव कि सेना को नष्ट करना शुरु कर दिया। आज रात्रि मे भी घनघोर युद्ध छिरा था। दुर्योधन ने कर्ण के पास जाकर कहा - कर्ण पांडव हमारी सेना का भीषन संहार कर रहा है। इस समय तुम हमारी सेना की रक्षा करो।
महाभारत युद्ध में घटोतकच की मृत्यु कैसे हुई? Mahabharat yudh mein ghatotkach ki mrityu kaise huye?

कर्ण बोला चिंता की कोई बात नहीं है। मैं प्रतिज्ञा करता हूं कि आज इंद्र द्वारा दी गई अमोद शक्ति से अर्जुन को अवश्य मार डालूंगा। फिर कर्ण पांडवों की सेना का भीषण संहार करने लगा। यह देख क्रोधित हो अर्जुन ने कृष्ण से रथ को कर्ण के सामने ले चलने का आग्रह किया। लेकिन कृष्ण ने अर्जुन को ना ले जाकर घटोत्कच को कर्ण के पास भेज दिया। 
महाभारत युद्ध में घटोतकच की मृत्यु कैसे हुई? Mahabharat yudh mein ghatotkach ki mrityu kaise huye?

घटोत्कच आकाश में उड़ उड़ कर कौरवो पर अस्त्र शस्त्र तथा पत्थरो की वर्षा करने लगा। कर्ण उसके माया को नष्ट नहीं कर सके। घटोत्कच ने कर्ण के रथ एवं घोड़े को नष्ट कर दिया। दुर्योधन ने कहा - कर्ण इस राक्षस को मारो अन्यथा यह कौरवो की सेना को नष्ट कर डालेगा।
महाभारत युद्ध में घटोतकच की मृत्यु कैसे हुई? Mahabharat yudh mein ghatotkach ki mrityu kaise huye?

गुस्से में कर्ण ने इंद्र द्वारा दिए अमोद शक्ति को घटोत्कच पर चला दिया। जिससे वह शक्ति घटोटकच को मारकर पुनः इंद्र के पास चली गई। घटोत्कच की मृत्यु से पांडव लोग बहुत दुखी हुए। लेकिन कृष्ण ने अर्जुन से कहा कर्ण अमोध शक्ति तुम्हें मारने के लिए रखा था अच्छा हुआ घटोत्कच को मारकर वापस चली गई। अब कर्ण तुम्हें नहीं मार सकता। क्योंकि वह साधारण योद्धा की तरह शक्तिहीन हो गया है।
महाभारत युद्ध में घटोतकच की मृत्यु कैसे हुई? Mahabharat yudh mein ghatotkach ki mrityu kaise huye?

जयद्रथ की मृत्यु कैसे हुई?

जयद्रथ की मृत्यु कैसे हुई? Jayadrath ki mrityu kaise huye?

जयद्रथ की मृत्यु कैसे हुई? Jayadrath ki mrityu kaise huye?
जयद्रथ की मृत्यु कैसे हुई? Jayadrath ki mrityu kaise huye?

श्री कृष्ण ने अर्जुन को जयद्रथ के मृत्यु के रहस्य बताए और इतना कह श्री कृष्ण सूर्य को माया द्वारा छिपा दिया। यह देख कौरवो में प्रसंता की लहर अच्छा गई। जयद्रथ अत्यंत खुशी से उछलते हुए अर्जुन को चिढ़ाने उसके आगे आया। 
जयद्रथ की मृत्यु कैसे हुई? Jayadrath ki mrityu kaise huye?
जयद्रथ की मृत्यु कैसे हुई? Jayadrath ki mrityu kaise huye?

उसी समय श्री कृष्ण ने अपनी माया हटा ली।  सूर्यास्त होने में कुछ विलंब था। तभी अर्जुन में अपने तीक्ष्ण वानो द्वारा जयद्रथ का सर काट डाला। वान सर को लिए जहां उसका पिता बैठ ध्यान मग्न थे। उन्ही के गोद में जा गिरा। ध्यान भंग होते ही जयद्रथ के पिता ने बिना देख सर को हाथों से पकड़ पृथ्वी पर गिरा दिए। तभी उनके सरो के सो टुकड़े होकर पृथ्वी पर गिर पड़ा। वे भी मृत्यु की गोद में चले गए।
जयद्रथ की मृत्यु कैसे हुई? Jayadrath ki mrityu kaise huye?
जयद्रथ की मृत्यु कैसे हुई? Jayadrath ki mrityu kaise huye?


जयद्रथ के मृत्यु का क्या रहस्य था?

जयद्रथ के मृत्यु का क्या रहस्य था? Jayadrath ke mrityu ka kya rahasy thha?

जयद्रथ के मृत्यु का क्या रहस्य था? Jayadrath ke mrityu ka kya rahasy thha?
जयद्रथ के मृत्यु का क्या रहस्य था? Jayadrath ke mrityu ka kya rahasy thha?

महाभारत युद्ध के चौदहवें दिन जयद्रथ की रक्षा के लिए जयद्रथ को व्युह बनाकर सबसे पीछे रखा गया था। उस दिन घमासान युद्ध हुआ। युद्ब करते सूर्यास्त का समय निकट आता जा रहा था। लेकिन जयद्रथ को मारना असंभव जान पड़ता था। 
जयद्रथ के मृत्यु का क्या रहस्य था? Jayadrath ke mrityu ka kya rahasy thha?
जयद्रथ के मृत्यु का क्या रहस्य था? Jayadrath ke mrityu ka kya rahasy thha?

तभी - भगवान श्री कृष्ण ने अर्जुन से कहा - अर्जुन दिग्गज वीरो के सामने रहते जयद्रथ को मारना असंभव हो रहा है। उसे धोखा देने के लिए मैं माया द्वारा सूर्य को अस्त होने से पहले ही छिपा देता हूं। सूर्यास्त होने जान जयद्रथ खुशी पूर्वक जब सामने आएगा तभी उसका वध कर डालना। लेकिन एक बात का ध्यान रखना। उसका सर पृथ्वी पर ना गिरने पाए।
जयद्रथ के मृत्यु का क्या रहस्य था? Jayadrath ke mrityu ka kya rahasy thha?
जयद्रथ के मृत्यु का क्या रहस्य था? Jayadrath ke mrityu ka kya rahasy thha?

अर्जुन के पूछने पर श्री कृष्ण ने कहा - जयद्रथ के पिता को कोई संतान ना थी।
जयद्रथ के मृत्यु का क्या रहस्य था? Jayadrath ke mrityu ka kya rahasy thha?
जयद्रथ के मृत्यु का क्या रहस्य था? Jayadrath ke mrityu ka kya rahasy thha?

 बहुत तपस्या के बाद जयद्रथ उत्पन्न हुआ उसका जन्म होते ही आकाशवाणी हुई। कि आपका यह पुत्र सुरवीर तथा बहुत भाग्यशाली होगा।  परंतु युद्ध क्षेत्र में कोई भी छत्रिय इसका सिर काट देगा। यही सुन उसके पिता ने उसी समय कहा था जो मेरे वीर पुत्र का सिर पृथ्वी पर गिराएगा। उसका भी सर एक सौ टुकड़ो में फट जायेगा। इसलिए जयद्रथ का सिर पृथ्वी पर गिरने न देना। बल्कि बानो द्वारा इसके पिता की गोद में गिरा देना।
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महाभारत युद्ध में अभिमन्यु की मृत्यु कैसे हुई?

महाभारत युद्ध में अभिमन्यु की मृत्यु कैसे हुई? Mahabharat yudh mein abhimanyu ki mrityu kaise huye?

महाभारत युद्ध में अभिमन्यु की मृत्यु कैसे हुई? Mahabharat yudh mein abhimanyu ki mrityu kaise huye?
महाभारत युद्ध में अभिमन्यु की मृत्यु कैसे हुई? Mahabharat yudh mein abhimanyu ki mrityu kaise huye?

भीष्म के बाद दुर्योधन ने आचार्य द्रोणाचार्य को मुख्य सेनापति बनाया। कर्ण भी अब युद्ध के मैदान में लड़ने चुका था। दो दिनों तक घमासान युद्ध चलता रहा। तेरहवे दिन द्रोणाचार्य की योजना अनुसार चक्रव्यूह की रचना की गई।  
महाभारत युद्ध में अभिमन्यु की मृत्यु कैसे हुई? Mahabharat yudh mein abhimanyu ki mrityu kaise huye?
महाभारत युद्ध में अभिमन्यु की मृत्यु कैसे हुई? Mahabharat yudh mein abhimanyu ki mrityu kaise huye?

अर्जुन को कौरवो के एक वीर योद्धा ने ललकार कर रणक्षेत्र से दूर लड़ने चला गया। इधर चक्रव्युह से घबराए पांडवों को देख सुभद्रा पुत्र अभिमन्यु ने पांडवों को ढांढस बनाया और कहा कि मैं इस चक्रव्युह को तोड़ूंगा। आप लोग मेरे साथ चलें। इतना कह अभिमन्यु कौरवो के बने चक्रव्युह को तोड़ता हुआ अंदर घुस पड़ा। कौरवो की सेना को मार-मार कर क्षत-विक्षत कर दिया।
महाभारत युद्ध में अभिमन्यु की मृत्यु कैसे हुई? Mahabharat yudh mein abhimanyu ki mrityu kaise huye?
महाभारत युद्ध में अभिमन्यु की मृत्यु कैसे हुई? Mahabharat yudh mein abhimanyu ki mrityu kaise huye?

तभी कर्ण, जयद्रथ, दुर्योधन, दुशासन, कृपाचार्य आदि वीरो ने एक साथ अभिमन्यु का वध कर डाला। अर्जुन के वापस लौटने पर जब उन्हें मालूम हुआ कि उनका प्यारा पुत्र अभिमन्यु जयद्रथ के कारण मारा गया है। तो उसी समय उन्होंने क्रोध में प्रतिज्ञा की कल सूर्यास्त तक मैं जयद्रथ का वध अवश्य करूंगा। अन्यथा मैं स्वयं अग्नि में प्रवेश कर जाऊंगा।
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