पांडव और द्रौपदी ने अपने प्राण का त्याग कैसे किया? पांडव और द्रौपदी की मृत्यु कैसे हुई?

पांडव और द्रौपदी ने अपने प्राण का त्याग कैसे किया? पांडव और द्रौपदी की मृत्यु कैसे हुई? Pandav aur draupadi ne apne pran ka tyag kaise kiya?

पांडव और द्रौपदी ने अपने प्राण का त्याग कैसे किया? पांडव और द्रौपदी की मृत्यु कैसे हुई? Pandav aur draupadi ne apne pran ka tyag kaise kiya?

धर्मराज युधिष्टिर को श्री कृष्ण, बलदेव सहित सभी यदुवंसियों का नाश सुनकर मन विरक्त हो गया। सभी भाइयों से विचार विमर्श कर युयुत्सु को बुला राज्य की देख रेख का भार सौप कर हस्तिनापुर के सिहांशन पर अभिमन्यु पुत्र परीक्षित को बिठा राज्यअभिषेक कर दिए। 
पांडव और द्रौपदी ने अपने प्राण का त्याग कैसे किया? पांडव और द्रौपदी की मृत्यु कैसे हुई? Pandav aur draupadi ne apne pran ka tyag kaise kiya?

फिर द्रौपदी सहित सभी भाई राजसी वस्त्र वतकल वस्त्र धारण कर वन को चल दिए। नगरवासी कुछ दूर जाने के बाद वापस आ गए। सबसे आगे युधिष्ठिर, भीमसेन, अर्जुन, नकुल, सहदेव और सबसे पीछे द्रौपदी चल रही थी। 

पांडव और द्रौपदी ने अपने प्राण का त्याग कैसे किया? पांडव और द्रौपदी की मृत्यु कैसे हुई? Pandav aur draupadi ne apne pran ka tyag kaise kiya?

हिमालय की चढ़ाई में सर्वप्रथम द्रौपदी गिर पड़ी और प्राण निकल गए। एक-एक कर भीमसेन, सहदेव, नकुल एवं अर्जुन भी चलते-चलते गिर पड़े और प्राण त्याग दिए। अंत में सिर्फ युधिष्ठिर ही एकमात्र अकेले बढ़ते गए। उनके पीछे - पीछे में एक कुत्ता भी चल रहा था। 
पांडव और द्रौपदी ने अपने प्राण का त्याग कैसे किया? पांडव और द्रौपदी की मृत्यु कैसे हुई? Pandav aur draupadi ne apne pran ka tyag kaise kiya?

उसी समय स्वयं इंद्र रथ पर सवार हो युधिष्ठिर को स्वर्ग ले जाने के लिए उनके पास पहुंचे। और पर बैठने को कहा। युधिष्टिर द्रौपदी सहित भाइयों के वियोग के कारण बैठने को तैयार नहीं हुए। तब इन्द्र देव ने कहा युधिष्टिर तुम चिंता मत करो।वे सभी स्वर्ग पहुंच चुके है। अतः तुम कुत्ते को छोड़ चले आओ। 
पांडव और द्रौपदी ने अपने प्राण का त्याग कैसे किया? पांडव और द्रौपदी की मृत्यु कैसे हुई? Pandav aur draupadi ne apne pran ka tyag kaise kiya?

युधिष्टिर ने कहा यह मेरा पूरा रास्ता साथ देते आया है मै इसे नहीं छोड़ सकता। कुत्ता वास्तव में धर्मराज थे। वे असली रूप में प्रकट हो युधिष्ठिर को आआशीर्वाद देकर अंतर्ध्यान हो गए। युधिष्टिर रथ पर सवार हो स्वर्ग चले गए।

श्री कृष्ण के वंसज यदुवंशी का विनाश कैसे हुआ?

श्री कृष्ण के वंसज यदुवंशी का विनाश कैसे हुआ? Shri krishan ke vansaj yaduvanshi ka vinash kaise hua?

श्री कृष्ण के वंसज यदुवंशी का विनाश कैसे हुआ? Shri krishan ke vansaj yaduvanshi ka vinash kaise hua?

महाभारत युद्ध के 35 वर्ष बाद 36 वर्ष में द्वारकापुरी में बड़े-बड़े भयंकर अपशकुन होने लगे। वहांसभी अनीति कर्म करने लगे। एक बार विश्वामित्र कण्व तथा अन्य ऋषियों के साथ वहां पधारें। उन्हें देख वहां के वासी ने उनसे मजाक करने की सोची। सभी ने जामवंती के पुत्र शाम्ब को स्त्री के रूप बना कमर में थोड़ी कपड़े को लपेट ऋषि के पास जाकर बोले - महाराज ! इस स्त्री को पुत्र होगा या पुत्री कृपया बता दे।
श्री कृष्ण के वंसज यदुवंशी का विनाश कैसे हुआ? Shri krishan ke vansaj yaduvanshi ka vinash kaise hua?

ऋषियों ने क्रोध में श्राप दे कहा - इससे ऐसा मुसल पैदा होगा। जो बलदेव और श्री कृष्ण को छोड़ सारा यदुवंशी को नष्ट कर देगा। कुछ समय बाद शाम के पेट से मुसल निकला। जिसे सबने मिलकर उसे जला डाला। और समुंद्र किनारे राख को फेक दी। वर्षा होने पर वहाँ बड़े-बड़े घास उग आएं। कृष्ण जी ने यादव वंसज के नष्ट निकट में आता देख सभी को तीर्थ यात्रा करने की सलाह दी।
श्री कृष्ण के वंसज यदुवंशी का विनाश कैसे हुआ? Shri krishan ke vansaj yaduvanshi ka vinash kaise hua?

सभी अपने अपने बाल बच्चे समेत प्रभास तीर्थ पहुंचे। यहां सभी मदिरा पीकर महाभारत युद्ध की चर्चा करने लगे। सात्यिक और कृतवर्मा में तू तू मैं मैं हो गई। सात्यिक ने कृतवर्मा की गर्दन काट डाली। विरोधियों ने कृष्ण पुत्र प्रधुम्न को मार डाला। श्री कृष्ण पुत्र शोक में क्रोधित हो समुंद्र किनारे उगे घास को खास को उखाड़कर सभी को मारने लगे। घास मुसल बन-बन कर यादव का नाश करने लगी। इस तरह सभी यादवो का विनाश देख बलराम व श्री कृष्ण शोक में एक वृक्ष के नीचे बैठे थे। बलराम जी के मुख से एक सफेद सर्प निकलकर समुंद्र में चली गई। बलदेव जी निर्जीव हो गए। बलदेव का प्राण त्याग देखकर श्री कृष्ण शोक मगन में बैठे थे। तभी जरा नामक शिकारी का वान उनके पैरों में लगा। उसने श्री कृष्ण का पैर पकड़ क्षमा याचना की। कृष्ण जी उसे समझा कर भेज दिए। और स्वयं पृथ्वी और आकाश को प्रकाशित करते हुए स्वर्ग को चले गए।


हस्तिनापुर वरिष्ठ ध्रितराष्ट्र, विदुर, गान्धारी और कुंति की मृत्यु कैसे हुई?

हस्तिनापुर वरिष्ठ ध्रितराष्ट्र, विदुर, गान्धारी और कुंति की मृत्यु कैसे हुई? Hastinapur varishth dhritarashhtr, vidur, gandhari aur kunti ki mrityu kaise huye?

हस्तिनापुर वरिष्ठ ध्रितराष्ट्र, विदुर, गान्धारी और कुंति की मृत्यु कैसे हुई? Hastinapur varishth dhritarashhtr, vidur, gandhari aur kunti ki mrityu kaise huye?

पांडवों ने पंद्रह वर्षों तक धृतराष्ट्र व गान्धारी की सेवा की। एक दिन धृतराष्ट्र ने युधिष्ठिर से कहा - अब हम लोग वनवास जीवन व्यतीत करना चाहते हैं।  व्यास जी के समझाने पर युधिष्ठिर ने आजा दे दी।  धृतराष्ट्र, गंधारी, संजय, विदुर जी एवं पांडवों की माता कुंती भी वन में चली गई। वन में ही विदुर जी अपने प्राण का त्याग कर दिए। संजय हिमालय की ओर चले गए।
हस्तिनापुर वरिष्ठ ध्रितराष्ट्र, विदुर, गान्धारी और कुंति की मृत्यु कैसे हुई? Hastinapur varishth dhritarashhtr, vidur, gandhari aur kunti ki mrityu kaise huye?

एक बार धृतराष्ट्र, गंधारी, कुंती घने वन में घूम रहे थे। तभी उस वन में चारों ओर से अग्नि भड़क उठी। वे तिनके उससे बाहर ना सके। उसी में जल गए।  पांडवों को जब ज्ञात हुआ। तो बहुत दुखी हुए। फिर उन सभी का श्राद कर्म पूर्ण किया।

अर्जुन की मृत्यु उसके पुत्र बभ्रु वाहन द्वारा कैसे हुआ?

अर्जुन की मृत्यु उसके पुत्र बभ्रु वाहन द्वारा कैसे हुआ? Arjun ki mrityu uske putra babhruvahan  dwara kaise hua?

अर्जुन की मृत्यु उसके पुत्र बभ्रु वाहन द्वारा कैसे हुआ? Arjun ki mrityu uske putra babhruvahan  dwara kaise hua?

युधिष्ठिर भिष्म आदि गुरुजनों की मृत्यु से दुःखित रहते थे। श्री कृष्ण ने उन्हें अश्वमेघ यज्ञ करने को कहा  इधर उतरा के गर्भ से परीझित का जन्म मृत्यु के जैसे हुआ। ऐसे बालक को देख कुंती, द्रौपदी और सुभद्रा विलाप करने लगी।  
अर्जुन की मृत्यु उसके पुत्र बभ्रु वाहन द्वारा कैसे हुआ? Arjun ki mrityu uske putra babhruvahan  dwara kaise hua?

श्री कृष्ण ने जल लेकर आचमन कीया और अपने योग बल से उस बालक में प्राण संचार कर दीया। सभी हर्षित हो उठें। वेदव्यास द्वारा शुभ मुहूर्त में संपन्न हुआ। श्याम कर्ण घोड़े को छोड़ा गया। घोड़े की रक्षा ले लिए अर्जुन ऊनी सेना लेकर उसके पीछे चले। सभी राजाओं को जीतते हुए मणिपुर पहुंचे। यहां उलपी द्वारा उत्पन्न अर्जुन पुत्र बभ्रु वाहन ने घोर युद्ध कर अर्जुन को मार डाला। 
अर्जुन की मृत्यु उसके पुत्र बभ्रु वाहन द्वारा कैसे हुआ? Arjun ki mrityu uske putra babhruvahan  dwara kaise hua?

उलपी द्वारा निंदा करने पर बभ्रु वाहन ने माता द्वारा लाई मनी से पुनः अर्जुन को जीवित कर उनसे क्षमा मांगी। फिर बाकी सभी राजाओं पर विजय प्राप्त कर वापस हस्तिनापुर पहुंचे। उनके पहुचते ही यज्ञ का सभी कार्य पूर्ण हुआ।

भिष्म पितामह ने मृत्यु के दौरान युधिष्टिर को कैसी शिक्षा दी?

भिष्म पितामह ने मृत्यु के दौरान युधिष्टिर को कैसी शिक्षा दी? Bhishm pitamah ne mrityu ke dauran yudhishthir ko kaisi shiksha di?

भिष्म पितामह ने मृत्यु के दौरान युधिष्टिर को कैसी शिक्षा दी? Bhishm pitamah ne mrityu ke dauran yudhishthir ko kaisi shiksha di?

भिष्म पितामह ने युधिष्ठिर के बहुत से प्रश्नों का उत्तर भी दिए। और कहा - जो गृहस्थ पुरुष अतिथि का सत्कार नहीं करता, वह अतिथि अपना पाप गृहस्थ को देकर उसका पुण्य लेकर चला जाता है। तुम भी अतिथि सत्कार से पीछे मत हटना। उधोग पुरुष को धन, मित्र, ऐश्वर्य और लक्ष्मी सभी प्राप्त होता है। प्रारब्ध के भरोसे बैठे रहने से कुछ भी प्राप्त नहीं होता है। 
भिष्म पितामह ने मृत्यु के दौरान युधिष्टिर को कैसी शिक्षा दी? Bhishm pitamah ne mrityu ke dauran yudhishthir ko kaisi shiksha di?

इसी प्रकार भिष्म ने और भी बहुत सी बातें बताई। और कहा - क्षात्र धर्म का पालन करते हुए पितृगण तथा देवगणों को प्रसन्न रखते हुए अपने प्रजा का पालन करो। तुम्हारे मन का सभी संताप दूर हो जाएगा। सूर्य के उत्तरायण होने पर पुनः मेरे पास आना।
भिष्म पितामह ने मृत्यु के दौरान युधिष्टिर को कैसी शिक्षा दी? Bhishm pitamah ne mrityu ke dauran yudhishthir ko kaisi shiksha di?

पचास दिन बाद सूर्य के उत्तरण होने पर माघ शुक्ल अष्टमी के दिन युधिष्ठिर अपने बंधु एवं श्री कृष्ण के साथ भिष्म के अग्नि संस्कार के संपूर्ण सामग्री लेकर कुरुक्षेत्र पहुंचे। सभी पहुंचकर भिष्म के चरण स्पर्श किए। भिष्म ने -  श्री कृष्ण से कहा अब मुझे जाने की आज्ञा दें। श्री कृष्ण ने तथास्तु कह दिया। भिष्म ने श्री कृष्ण को प्रणाम कर अपना प्राण त्याग दिए। युधिष्टिर ने परिवार सहित विधि पूर्वक उनका श्राद्ध कर्म किया।
भिष्म पितामह ने मृत्यु के दौरान युधिष्टिर को कैसी शिक्षा दी? Bhishm pitamah ne mrityu ke dauran yudhishthir ko kaisi shiksha di?

गान्धारी ने श्री कृष्ण को श्राप क्यों दिए?

गान्धारी ने श्री कृष्ण को श्राप क्यों दिए? Gandhari ne shri krishan ko shrap kyon diye?

गान्धारी ने श्री कृष्ण को श्राप क्यों दिए? Gandhari ne shri krishan ko shrap kyon diye?

गांधारी ने श्री कृष्ण से कहा - है कृष्ण। तुम्हारे कारण ही मेरे वंश का विनाश हुआ है। इसलिए मैं अपने पति सेवा के वल पर श्राप देती हूं, कि आज से 36 वर्ष बाद तुम भी अपनी जाति का नाश कर वन में मारे जाओगे।
गान्धारी ने श्री कृष्ण को श्राप क्यों दिए? Gandhari ne shri krishan ko shrap kyon diye?

श्री कृष्ण ने कहा - है गंधारी तुमने वही कहा जो होना है। इसमें कोई कुछ नहीं कर सकता। इसलिए क्रोध को त्याग कर शान्त होवो। फिर सभी वीर योद्धाओं का दाह क्रिया की गई।

महाभारत युद्ध में दुर्योधन की मृत्यु कैसे हुई? Mahabharat yudh mein duryodhan ki mrityu kaise huye?

महाभारत युद्ध में दुर्योधन की मृत्यु कैसे हुई? Mahabharat yudh mein duryodhan ki mrityu kaise huye?

महाभारत युद्ध में दुर्योधन की मृत्यु कैसे हुई? Mahabharat yudh mein duryodhan ki mrityu kaise huye?

महाभारत युद्ध में कौरवो की हार देखकर दुर्योधन वहां से भाग गया। अस्वाथाम, कृपाचार्य को संजय द्वारा दुर्योधन के छिपने की खबर मालूम हुई तो वे तलाब के पास जाकर जोर से पुकारे - है दुर्योधन तुम बाहर निकलो और चलकर पांडवों से संघर्ष करो। हम लोग तुम्हारी रक्षा करेंगे। दुर्योधन बोला मैं घाव से पीड़ितों हूँ। कल युध्द करेंगे। पांडव लोग भी दुर्योधन का पता कर रहे थे। क्योंकि दुर्योधन के रहते पांडव विजयी नहीं हो सकते थे। 
महाभारत युद्ध में दुर्योधन की मृत्यु कैसे हुई? Mahabharat yudh mein duryodhan ki mrityu kaise huye?

एक शिकारी द्वारा पांडवों को दुर्योधन की छिपने का स्थान मालूम हुआ। तुरंत युधिष्ठिर, भीम आदि सेना लेकर वहां पहुंचे। अश्वत्थामा, कृपाचार्य, कृतवर्मा ने पांडवों को आते देख दुर्योधन को सावधान कर स्वयं पेड़ो पर जाकर छुपा गया। युधिष्ठिर तलाब के किनारे खरा होकर दुर्योधन को बोले - हे दुर्योधन - है दुर्योधन ! तुम अपनी सभी भाइयों और क्षत्रियों को मरवाकर कायर की तरह यहां छिपे हो। धिक्कार है तुम्हें। तुम बाहर निकलो और वीरों की तरह  लड़कर मरो या मारो।
महाभारत युद्ध में दुर्योधन की मृत्यु कैसे हुई? Mahabharat yudh mein duryodhan ki mrityu kaise huye?

दुर्योधन बोला - हे धर्मराज मैं प्राण मोह से यहां नहीं छिपा हूं। मैं घायल हूं और सिर्फ एक गद्दा मेरे पास है। मैं एक-एक से गदा युद्ध कर सकता हूं।  युधिष्ठिर के आश्वासन पर दुर्योधन गद्दा लिए तलाब से बाहर निकला।  सर्वप्रथम भीम हि दुर्योधन से लड़ने आए। दोनो में भयंकर गदा युद्ध छिड़ गया। 
महाभारत युद्ध में दुर्योधन की मृत्यु कैसे हुई? Mahabharat yudh mein duryodhan ki mrityu kaise huye?

भीम ने अपनी प्रतिज्ञानुसार दुर्योधन की जांघ को अपनी गद्दा से तोड़ डाली। दुर्योधन धारासाई हो भूमि पर गिर पड़ा। दुर्योधन को छोड़ सभी पांडव कृष्ण सहित चले गए।